बिहारी के पदों का अर्थ { सीबीएसई क्लास 10 हिंदी स्पर्श }
बिहारी
बिहारी का जन्म 1595 में ग्वालियर में हुआ था। बिहारी रसिक जीव थे पर इनकी रसिकता नागरिक जीवन की रसिकता थी। उनका स्वभाव विनोदी और व्यंग्यप्रिय था। 1663 में उनका देहावसान हुआ। बिहारी की एक ही रचना 'सतसई ' उपलब्ध है जिसमें लगभग 700 दोहे संगृहीत हैं।
इनकी कविता शृंगार रस की है इसलिए नायक ,नायिका या नायिकी की वे चेष्टाएँ जिन्हें हाव कहते हैं ,इनमें पर्याप्त मात्रा में मिलती है। बिहारी की भाषा बहुत कुछ ब्रज और बुंदेलखंडी हैं। आइये अब उनके दोहे और उनका भावार्थ देखे :--
( 1 ) सोहत ओढ़ैं पीतु पटु स्याम ,सलौनैं गात।
मनौ नीलमनि -सैल पर आतपु परयौ प्रभात।।
इस दोहे में कवि ने श्री कृष्ण के साँवले शरीर की सुंदरता का बखान किया है। कवि कहते हैं कि श्री कृष्ण के साँवले शरीर पर पीले वस्त्र बहुत अच्छे लग रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे नीलमणि पर्वत पर प्रातः काल की धूप पड़ रही हो। यहाँ पर श्री कृष्ण के साँवले शरीर को नीलमणि पर्वत तथा पीले वस्त्र ,सूर्य की धूप को कहा गया है।
( 2 ) कहलाने एकत बसत अहि मयूर ,मृग बाघ।
जगतु तपोबन सौ कियौ दीरघ -दाघ निदाघ।।
इस दोहे में बिहारी कहते हैं कि भीषण गर्मी से बेहाल होकर सभी जानवर एक ही स्थान पर बैठे हैं। मोर और साँप एक साथ बैठे हैं,हिरण और शेर एक साथ बैठे हैं। कवि ने भीषण गर्मी की तुलना तपोवन से की है , जैसे पुराने समय में ऋषि मुनियों के तप के प्रभाव से सारे प्राणी अपना आपसी द्वेष भुला कर एक साथ रहते थे उसी तरह गर्मी से बेहाल ये जानवर भी आपसी द्वेष को भुला कर एक साथ बैठे हैं।
( 3 ) बतरस -लालच लाल की मुरली धरी लुकाइ।
सौह करैं भौंहनु हँसै , दैन कहैं नटि जाइ।।
इस दोहे में बिहारी गोपियों द्वारा श्री कृष्ण की बाँसुरी चुराए जाने का वर्णन करते हैं। कवि कहते हैं कि गोपियों ने श्री कृष्ण से बात करने के लालच में उनकी बाँसुरी को चुरा लिया है। गोपियाँ कसम भी खाती हैं कि उन्होंने बाँसुरी नहीं चुराई है लेकिन बाद में भोंहे घुमाकर हंसने लगती हैं और बाँसुरी देने से मना कर रही हैं।इस प्रकार श्रीकृष्ण का गोपियों के साथ प्रेम -भाव वाला वाद-विवाद चलता रहता है।
( 4 ) कहत ,नटत ,रीझत ,खीझत ,मिलत ,खिलत ,लजियात।
भरे भौन मैं करत हैं नैननु ही सब बात।।
इस दोहे में बिहारी ने दो प्रेमियों के उस स्थान पर मिलने का वर्णन किया है जहाँ और लोग भी बैठे हैं। अत: वे बात करके एक - दूसरे को मन के भाव नहीं बता सकते। इसलिए नायक और नायिका एक दूसरे से आँखों ही आँखों में बातचीत करते हैं। नायक की बातों का उत्तर कभी नायिका इंकार से देती है,कभी उसकी बातों पर मोहित हो जाती है ,कभी बनावटी गुस्सा दिखाती है और जब उनकी आँखे फिर से मिलती हैं तो वे दोनों खुश हो जाते हैं और कभी - कभी लज्जा भी जाते हैं। कवि कहते हैं कि इस तरह वे भीड़ में भी एक दूसरे से बात करते हैं और किसी को ज्ञात भी नहीं होता।
( 5 ) बैठि रही अति सघन बन ,पैठि सदन - तन माँह।
देखि दुपहरी जेठ की छाँहौं चाहति छाँह।।
बिहारीजी कहते हैं कि जेठ महीने की गर्मी इतनी अधिक हो रही है कि छाया भी छाया ढूँढ रही है अर्थात वह भी गर्मी से बचने के लिए जगह तलाश कर रही है। वह या तो किसी घने जंगल में मिलेगी या किसी घर के अंदर। यहाँ मूल रूप से कवि ने प्रकृति के बदलते रूप का वर्णन किया है।
( 6 ) कागद पर लिखत न बनत ,कहत सँदेसु लजात।
कहिहै सबु तेरौ हियौ ,मेरे हिय की बात।।
बिहारी कहते हैं कि नायिका अपनी विरह की पीड़ा को कागज़ पर नहीं लिख पा रही है और कह कर सन्देश भेजने में उसे शर्म आ रही है वह नायक से कहती है कि मैंने मेरे दिल की बात तुम्हारे दिल तक पहुँचा दी है अत: तुम अपने ह्रदय से पूछ लो वह मेरे हृदय की बात जानता है अर्थात तुम मेरी विरह दशा से भली भांति परिचित होंगे।
( 7 ) प्रगट भय द्विजराज - कुल ,सुबस बसे ब्रज आइ।
मेरे हरौ कलेस सब ,केसव केसवराइ।।
बिहारी कहते हैं कि हे ! श्री कृष्ण आपने चंद्र वंश में जन्म लिया और स्वयं ही ब्रज में आकर बस गए। बिहारी जी के पिता का नाम केशवराय है और श्री कृष्ण का एक नाम केशव है, इसलिए कवि कहते हैं कि आप मेरे पिता के समान हैं अतः मेरे सारे कष्टों का नाश कर दीजिये।
( 8 ) जपमाला ,छापैं ,तिलक सरै न एकौ कामु।
मन - काँचै नाचै बृथा साँचै राँचै रामु।।
बिहारीजी कहते हैं कि केवल ईश्वर के नाम की माला जपने से , ईश्वर नाम लिख लेने से तथा तिलक करने से ईश्वर भक्ति का कार्य पूरा नहीं होता। यदि मन में ईश्वर के लिए विश्वास न हो तो उसकी भक्ति में नाचना भी व्यर्थ है। इसके विपरीत जो सच्चे मन से ईश्वर भक्ति करते हैं, ईश्वर उन्ही पर प्रसन्न होते हैं। इसका मूल भाव ये है कि भगवान को खुश करने के लिए बाहरी दिखावा करना व्यर्थ है क्योंकि वे तो सच्चे मन से की गयी प्रार्थना से ही प्रसन्न होते है।
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